Tuesday, August 12, 2014

!... SIPAAHI ...!

!... SIPAAHI ...!


नत्मस्तक हूँ उस इंसान के मैं ,
     जो खुदा भी है, भगवान भी है ।
तेरा - मेरा रखवाला है जो,
     वो सिपाही हमारी शान भी है ।।

खड़ा देश की सीमा पर है,
     निडर और हिम्मतवाला बनकर ।
नाउम्मीद हमारी दूर कर रहा,
     अंधेरे में एक उजाला बनकर ।।

छोड़कर अपने बूढ़े माँ - बाप ,
     आ पहुँचा है वो सीमा पार ।
मेरी रक्षा करने कि खातिर,
     खुद पर खाता है पहला वार ।।
        
नहीं लगता अब डर दुश्मन से,
    वो सिपाही मुझे बचाता है ।
मेरे वतन के हमलावर को,
    वो सिपाही मार भगाता है ।।

मैं यहाँ आराम से सो रहा हूँ ,
    क्योंकि वो सिपाही मेरे संग है ।
कल तक था जहाँ गहरा सन्नाटा ,
    आज वह मैदान-ऐ-जंग है ।।

इस मैदान-ऐ-जंग में देखो ,
    चारों ओर है रक्त की धारा ।
जिस मिट्टी से जन्मा था वो ,
    उसी मिट्टी से मिलने जा रहा ।।

गलत कहते हैं लोग मुझे कि ,
    बाॅर्डर तो जंग का मैदान है ।
खड़ा होकर ज़रा देख ले तू भी ,
    वहाँ तो शहीदों का शमशान है ।।

नहीं चाहता है कोई भी जंग, 
    तो आखिर क्यों ये गोलियाँ चलती हैं ।
क्या दोष था उस वीर का बोलो ?
    जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।
    जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।

---  जय हिंद ---

             - Anuj Prakash Gautam

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