!... SIPAAHI ...!
नत्मस्तक हूँ उस इंसान के मैं ,
जो खुदा भी है, भगवान भी है ।
तेरा - मेरा रखवाला है जो,
वो सिपाही हमारी शान भी है ।।
खड़ा देश की सीमा पर है,
निडर और हिम्मतवाला बनकर ।
नाउम्मीद हमारी दूर कर रहा,
अंधेरे में एक उजाला बनकर ।।
छोड़कर अपने बूढ़े माँ - बाप ,
आ पहुँचा है वो सीमा पार ।
मेरी रक्षा करने कि खातिर,
खुद पर खाता है पहला वार ।।
नहीं लगता अब डर दुश्मन से,
वो सिपाही मुझे बचाता है ।
मेरे वतन के हमलावर को,
वो सिपाही मार भगाता है ।।
मैं यहाँ आराम से सो रहा हूँ ,
क्योंकि वो सिपाही मेरे संग है ।
कल तक था जहाँ गहरा सन्नाटा ,
आज वह मैदान-ऐ-जंग है ।।
इस मैदान-ऐ-जंग में देखो ,
चारों ओर है रक्त की धारा ।
जिस मिट्टी से जन्मा था वो ,
उसी मिट्टी से मिलने जा रहा ।।
गलत कहते हैं लोग मुझे कि ,
बाॅर्डर तो जंग का मैदान है ।
खड़ा होकर ज़रा देख ले तू भी ,
वहाँ तो शहीदों का शमशान है ।।
नहीं चाहता है कोई भी जंग,
तो आखिर क्यों ये गोलियाँ चलती हैं ।
क्या दोष था उस वीर का बोलो ?
जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।
जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।
--- जय हिंद ---
- Anuj Prakash Gautam
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