Wednesday, August 13, 2014

... MERI DOST ...

कई साल पहले बनी थी जो,
       एक दोस्त है मेरी आज भी वो ।
ऐसे हँसती है कि क्या बताऊं तुम्हें,
       उसकी हर अदा पर मर मिटा हूँ मैं ।।

देखते ही उसे, दिल मचल सा जाता है ,
       छूते ही उसे, हाथ फिसल सा जाता है ।
गोरा रंग है उसका, हैं लम्बे बाल ।
      आँखें हैं नशीली उसकी, चले मतवाली चाल ।।

उसके पास जाते ही ,
        गले लगाने को जी चाहता है ।
उसकी झील सी आँखों में ,
        खो जाने को जी चाहता है ।।

रूप में जितनी सुंदर है वो ,
          मन भी उतना ही है साफ़ ।
भूल अगर हो जाए कोई मुझसे,
         तो भी मुझे कर देती माफ ।।

थोड़ी नाराज़ जरूर हो जाती है ,
         जब कभी मैं उसे सताता हूँ ।
पर हँस देती है जल्दी ही वो ,
           जैसे ही उसे मनाता हूँ ।।

कोई राज़ अगर मैं उसे कह दूँ ,
         उस बात को ना कहीं बताती है ।
मैं खुश हूँ तो हँस देती है ,
         मैं दुखी हूँ तो रो जाती है ।।

दुआ करता हूँ बस यही ,
           कि वो ना कभी बदल जाए ।
जिस तरह वो मेरी दोस्त है आज,
           हर जन्म में बस मुझे अपनाए ।।

प्यार चाहे तो ना करे मुझसे ,
          पर दोस्ती अपनी निभाती रहे ।
कल जब मुझसे दूर जाएगी ,
          मिलने मुझसे वो आती रहे ।।
          मिलने मुझसे वो आती रहे ।।


                      - ANUJ PRAKASH GAUTAM

Tuesday, August 12, 2014

!... SIPAAHI ...!

!... SIPAAHI ...!


नत्मस्तक हूँ उस इंसान के मैं ,
     जो खुदा भी है, भगवान भी है ।
तेरा - मेरा रखवाला है जो,
     वो सिपाही हमारी शान भी है ।।

खड़ा देश की सीमा पर है,
     निडर और हिम्मतवाला बनकर ।
नाउम्मीद हमारी दूर कर रहा,
     अंधेरे में एक उजाला बनकर ।।

छोड़कर अपने बूढ़े माँ - बाप ,
     आ पहुँचा है वो सीमा पार ।
मेरी रक्षा करने कि खातिर,
     खुद पर खाता है पहला वार ।।
        
नहीं लगता अब डर दुश्मन से,
    वो सिपाही मुझे बचाता है ।
मेरे वतन के हमलावर को,
    वो सिपाही मार भगाता है ।।

मैं यहाँ आराम से सो रहा हूँ ,
    क्योंकि वो सिपाही मेरे संग है ।
कल तक था जहाँ गहरा सन्नाटा ,
    आज वह मैदान-ऐ-जंग है ।।

इस मैदान-ऐ-जंग में देखो ,
    चारों ओर है रक्त की धारा ।
जिस मिट्टी से जन्मा था वो ,
    उसी मिट्टी से मिलने जा रहा ।।

गलत कहते हैं लोग मुझे कि ,
    बाॅर्डर तो जंग का मैदान है ।
खड़ा होकर ज़रा देख ले तू भी ,
    वहाँ तो शहीदों का शमशान है ।।

नहीं चाहता है कोई भी जंग, 
    तो आखिर क्यों ये गोलियाँ चलती हैं ।
क्या दोष था उस वीर का बोलो ?
    जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।
    जिसकी हर सुबह ऐसे ठलती है ।।

---  जय हिंद ---

             - Anuj Prakash Gautam

क़ैद

  ... क़ैद ... सन्नाटा   पसरा   है   हर   जगह ,      एक   डर   का   माहौल   सा   छाया   है   । भले   क़ैद   हूँ   मैं   आज   यहाँ ,      पर ...