नज़ारा देखकर आज जैसा,
मैं थोड़ा हैरान हो गया ।
जातिवाद की इस भावना से,
मैं थोड़ा परेशान हो गया ।।
कई पीड़ियों से हम इसमें जी रहें हैं,
मैं थोड़ा हैरान हो गया ।
जातिवाद की इस भावना से,
मैं थोड़ा परेशान हो गया ।।
कई पीड़ियों से हम इसमें जी रहें हैं,
सदियों से हम ये ज़हर पी रहें हैं ।
पर कोई नहीं सुनता आस हमारी, कोई नहीं बुझाता ये प्यास हमारी ।।
पर कोई नहीं सुनता आस हमारी, कोई नहीं बुझाता ये प्यास हमारी ।।
गाँव-गाँव और गली-गली में,
हर जगह बस यही नज़ारा है ।
पिछड़े, परंपरा के नाम पर दब रहे,
हमको ना किसी का सहारा है ।।
हर जगह बस यही नज़ारा है ।
पिछड़े, परंपरा के नाम पर दब रहे,
हमको ना किसी का सहारा है ।।
एक उम्मीद है हमारी आँखों में,
कि कल एक नया सवेरा होगा ।
पढ़-लिखकर हम भी आगे बड़ेंगे,
मेरी खुशी पर हक् सिफॆ मेरा होगा ।।
कि कल एक नया सवेरा होगा ।
पढ़-लिखकर हम भी आगे बड़ेंगे,
मेरी खुशी पर हक् सिफॆ मेरा होगा ।।
पर लगता है कभी कभी ऐसा भी,
ये खुशी तो बस एक सपना है ।
इस जातिवाद के खौफ़ के कारण,
सब गैर हैं, ना कोई अपना है ।।
ये खुशी तो बस एक सपना है ।
इस जातिवाद के खौफ़ के कारण,
सब गैर हैं, ना कोई अपना है ।।
किसी सवर्ण के साथ बैठने से,
मैं आज भी बहुत घबराता हूँ ।
पढ़ाई तो करी है आगे बड़ने की,
पर अभी भी "पिछड़ा" कहलाता हूँ ।।
पढ़ाई तो करी है आगे बड़ने की,
पर अभी भी "पिछड़ा" कहलाता हूँ ।।
आखिर कारण है क्या,
जो आज भी मुझे लोग अपनाते नहीं ।
एक ही गाँव में रहते हैं हम,
फिर भी साथ मुझे बैठाते नहीं ।।
जो आज भी मुझे लोग अपनाते नहीं ।
एक ही गाँव में रहते हैं हम,
फिर भी साथ मुझे बैठाते नहीं ।।
क्यों आज भी कुछ जगहों पर,
मंदिर मैं नहीं जा पाता हूँ ।
क्यों कुछ नदियों-तालाबों से,
अपनी प्यास नहीं बुझा पाता हूँ ।।
मंदिर मैं नहीं जा पाता हूँ ।
क्यों कुछ नदियों-तालाबों से,
अपनी प्यास नहीं बुझा पाता हूँ ।।
समय तो बीत रहा है तेजी से,
और आगे भी ये गतिवान रहेगा ।
पर कब उस बदलाव की घड़ी आएगी,
जब हमें इंसान होने का सम्मान मिलेगा ।।
पर कब उस बदलाव की घड़ी आएगी,
जब हमें इंसान होने का सम्मान मिलेगा ।।
ना जाने कितने सपने टूटे हैं,
कितनी आँसुओं कि नदियाँ बह गईं ।
सोच तो बदली है इस नई पीढ़ी की,
पर अभी भी कई कमीयाँ रह गईं ।।
कितनी आँसुओं कि नदियाँ बह गईं ।
सोच तो बदली है इस नई पीढ़ी की,
पर अभी भी कई कमीयाँ रह गईं ।।
उम्मीद है ये नए "आज" की सोच,
जातिवाद की सरहदें तोड़ देगी ।
पिछड़े और सवॆणों की ये परंपरा,
नई पीढ़ी पीछे छोड़ देगी ।।
पिछड़े और सवॆणों की ये परंपरा,
नई पीढ़ी पीछे छोड़ देगी ।।
यदी ये उम्मीद सम्पूर्ण हो जाए,
तो जीवन में ना जाति-भाव रहेगा ।
सब साथ रहेंगे, साथ बैठेंगे,
और ना किसी से कोई भेदभाव रहेगा ।।
तो जीवन में ना जाति-भाव रहेगा ।
सब साथ रहेंगे, साथ बैठेंगे,
और ना किसी से कोई भेदभाव रहेगा ।।
--- A. P. Gautam